रायपुर साहित्य उत्सव–2026 : शब्द, रंग और संस्कारों का विराट संगम
तीसरे दिन भी उमड़ा जनसैलाब, साहित्य, कला, बाल साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ गहन विमर्श
रायपुर, 25 जनवरी 2026/
नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित तीन दिवसीय ‘रायपुर साहित्य उत्सव–2026’ के तीसरे दिन भी साहित्यप्रेमियों का उत्साह चरम पर रहा। सुबह से ही विभिन्न सत्रों, परिचर्चाओं और प्रदर्शनों को देखने-सुनने के लिए बड़ी संख्या में नागरिक, विद्यार्थी, शोधार्थी, साहित्यकार और कला प्रेमी परिसर में पहुंचे। पंजीयन काउंटरों पर लंबी कतारें इस बात का प्रमाण रहीं कि साहित्य के प्रति जन-जुड़ाव निरंतर बढ़ रहा है।
‘नवयुग में भारत बोध’ : शिक्षा और मीडिया के भारतीयकरण पर मंथन
श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में आयोजित परिचर्चा “नवयुग में भारत बोध” कार्यक्रम मावली प्रसाद श्रीवास्तव को समर्पित रही।
परिचर्चा के सूत्रधार श्री प्रभात मिश्रा रहे। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. संजीव शर्मा एवं डॉ. संजय द्विवेदी उपस्थित रहे।
डॉ. संजीव शर्मा ने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारत बोध को समुचित स्थान दिया गया है। भारतीय संस्कृति केवल आत्मकल्याण तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व कल्याण की भावना से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य संकीर्णता से मुक्त कर मानवीय मूल्यों से जोड़ना होना चाहिए।
उन्होंने प्राथमिक शिक्षा स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक शब्दावली और दृष्टि को पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया और अंग्रेजों द्वारा किए गए मानसिक आक्रमण से उबरने की बात कही।
डॉ. संजय द्विवेदी ने कहा कि भारतीय भाषाओं में ज्ञान और विज्ञान दोनों समाहित हैं। भारत ने कभी अपने विचार थोपे नहीं, बल्कि विवेकानंद की तरह उन्हें विश्व के सामने प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय पत्रकारिता को पश्चिमी ढांचे से बाहर निकालकर भारतीय मूल्यों से जोड़ना होगा। “भारत को जानो, भारत को मानो” को उन्होंने भारत बोध का मूल सूत्र बताया।
साहित्य के साथ रंगों का उत्सव : चित्रकला प्रदर्शनी बनी आकर्षण का केंद्र
सुरेंद्र दुबे मंडप में आयोजित भव्य चित्रकला प्रदर्शनी ने साहित्य उत्सव को रंगों की नई ऊंचाई दी।
रायपुर की कलाकार श्रीमती सोनल शर्मा द्वारा निर्मित छत्तीसगढ़ महतारी का चित्र दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहा।
बस्तर बाजार, राजिम कुंभ, रामगढ़ की पहाड़ियां और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते चित्रों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
कार्यशाला संयोजक भोजराज धनगर ने बताया कि राज्य के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित इस प्रदर्शनी के साथ-साथ पेंटिंग एवं कार्टून कार्यशालाएं भी संचालित की जा रही हैं, जहां युवा कलाकारों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिल रहा है।
यह मंडप सेल्फी हॉटस्पॉट के रूप में भी उभरा।
बाल साहित्य पर गंभीर विमर्श : ‘संस्कारों की पाठशाला है बाल साहित्य’
कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप में आयोजित परिचर्चा बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर केंद्रित रही, जो साहित्यकार नारायण लाल परमार को समर्पित थी।
मुख्य वक्ता डॉ. गोपाल दवे और श्री बलदाऊ राम साहू रहे, जबकि सूत्रधार श्री एस.के. बिसेन थे।
डॉ. गोपाल दवे ने कहा कि विज्ञानसम्मत बाल साहित्य का लेखन आज अनिवार्य है। बच्चों को सरल भाषा के साथ शब्दकोश से जोड़ने की आवश्यकता है।
श्री बलदाऊ राम साहू ने कहा कि बाल साहित्य के बिना शिक्षा की कल्पना अधूरी है। यह बच्चों को संवेदनशील, संस्कारित और विचारशील बनाता है।
इस अवसर पर तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।
‘नाट्यशास्त्र और कला परंपरा’ : गुरु-शिष्य परंपरा पर जोर
श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में आयोजित दूसरे सत्र में “नाट्यशास्त्र और कला परंपरा” विषय पर परिचर्चा हुई, जो राजा चक्रधर सिंह को समर्पित थी।
मुख्य अतिथि डॉ. सच्चिदानंद जोशी और डॉ. लवली शर्मा रहीं।
डॉ. जोशी ने कहा कि नाट्यशास्त्र एक संपूर्ण जीवन दर्शन है। यूनेस्को द्वारा नाट्यशास्त्र और भगवद्गीता की पांडुलिपियों को वैश्विक मान्यता मिलना भारतीय ज्ञान परंपरा का सम्मान है।
डॉ. लवली शर्मा ने दुर्लभ वाद्य यंत्रों के संरक्षण, शिल्पकारों के सम्मान और गुरु-शिष्य परंपरा को सशक्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
साहित्य उत्सव बना सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक
रायपुर साहित्य उत्सव–2026 न केवल साहित्यिक आयोजन रहा, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला, शिक्षा और चेतना का जीवंत उत्सव बनकर उभरा।
जनसहभागिता, विचार-विमर्श और बहुआयामी गतिविधियों ने इसे प्रदेश में साहित्यिक पुनर्जागरण का प्रतीक बना दिया है।