भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेहरों की कमी कोई नई बात नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दल आदिवासी नेतृत्व के अभाव से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि आदिवासी नेताओं पर सीधी राजनीतिक कार्रवाई से दोनों पार्टियां अक्सर बचती रही हैं। विजय शाह का ताजा मामला इस सियासी संतुलन की मजबूरी को उजागर करता है।

विजय शाह पर कार्रवाई से पीछे हटी भाजपा

सेना पर विवादित बयान देने के बाद भी भाजपा नेता विजय शाह पर पार्टी कोई कड़ा रुख नहीं अपना सकी है। हाई कोर्ट के आदेश के हवाले से सरकार खुद को बचाते हुए दिख रही है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि पार्टी के पास आदिवासी वर्ग से आने वाले बड़े नेताओं की भारी कमी है।

भाजपा में पहले से नेतृत्व का अभाव

छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद भाजपा के पास विष्णुदेव साय, रामविचार नेताम, नंद कुमार साय जैसे दमदार आदिवासी नेता भी नहीं बचे। कांग्रेस से लाए गए दिलीप सिंह भूरिया कुछ समय के लिए आदिवासी चेहरा बने रहे, लेकिन उनके निधन के बाद पार्टी इस वर्ग से प्रभावशाली नेतृत्व तैयार नहीं कर सकी। उनकी बेटी निर्मला भूरिया आज भी मंत्री जरूर हैं, पर प्रभाव सीमित है।

फग्गन सिंह से लेकर बिसाहू लाल तक सीमित दायरा

महाकोशल में फग्गन सिंह कुलस्ते, ज्ञान सिंह और ओमप्रकाश धुर्वे जैसे नाम जरूर हैं, लेकिन पार्टी को कांग्रेस से आए बिसाहू लाल सिंह को भी मंत्री बनाना पड़ा। वहीं, मालवा में रंजना बघेल जैसी नेताओं को वर्षों से हाशिए पर रखा गया है।

छिंदवाड़ा से कमलेश शाह को लाकर भरने की कोशिश

छिंदवाड़ा, सिवनी और बालाघाट जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आदिवासी नेतृत्व की कमी पूरी करने के लिए पार्टी ने कांग्रेस से कमलेश शाह को शामिल किया, और अब उन्हें मंत्री बनाए जाने की संभावना जताई जा रही है।

निमाड़ के बाहर नहीं है विजय शाह का असर

राजघराने से आने वाले विजय शाह लंबे समय से मंत्री जरूर हैं, लेकिन निमाड़ क्षेत्र से बाहर उनकी पकड़ नहीं है। पूर्व में अंतर सिंह आर्य, प्रेम सिंह पटेल, मीना सिंह जैसे मंत्री बने, लेकिन उनका प्रभाव भी सीमित रहा। ओमप्रकाश धुर्वे को राष्ट्रीय पद दिया गया, लेकिन वह भी राज्य स्तर पर प्रभाव नहीं बना सके।

नए चेहरों से भी नहीं मिला करिश्मा

प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने नए आदिवासी चेहरों को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन वे भी कोई बड़ा प्रभाव नहीं छोड़ सके। गजेंद्र सिंह पटेल दो बार लोकसभा जीतने के बाद भी निष्क्रिय दिखते हैं।

निष्कर्ष: नेतृत्व के संकट से जूझ रही हैं दोनों पार्टियां

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिशों में लगी हैं, लेकिन प्रभावशाली आदिवासी नेतृत्व के अभाव में यह वर्ग लगातार उपेक्षित महसूस कर रहा है। विधानसभा से लेकर लोकसभा तक आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, और यह चिंता चुनावों तक दोनों पार्टियों को सताती रहेगी।


By Dhirendra Giri Goswami

धीरेंद्र गिरि गोस्वामी एक प्रसिद्ध पत्रकार हैं, जो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से हैं। उनके पिता रमन गिरि गोस्वामी छत्तीसगढ़ में प्रथम श्रेणी के शासकीय अधिकारी रह चुके हैं। धीरेंद्र गिरि गोस्वामी ने पत्रकारिता के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई भी की है। उन्होंने टीवी, डिजिटल, प्रिंट और रेडियो मीडिया में 15 वर्षों से अधिक अनुभव प्राप्त किया है। अपने करियर में उन्होंने वनइंडिया, खबर भारती, स्वराज एक्सप्रेस, बंसल न्यूज, ईटीवी, न्यूज वर्ल्ड और भारत समाचार जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संवाददाता और सीनियर रिपोर्टर के रूप में काम किया है। धीरेंद्र ने दूरदर्शन (DD News) में रिपोर्टिंग और लाइव कवरेज किया है और आकाशवाणी (All India Radio) में युवाओं और बच्चों के कार्यक्रमों का सफलतापूर्वक संचालन एवं प्रस्तुति दी है। वर्तमान में वे खबरवीर वेबसाइट के संपादक हैं, जहाँ वे ताज़ा समाचार, गहन विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग प्रदान करते हैं। उनका मुख्य फोकस राजनीति, प्रशासनिक मामलों, सामाजिक मुद्दों और कानूनी विश्लेषण पर आधारित पत्रकारिता है। धीरेंद्र ने पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर, वकालत (LLB) की पढ़ाई भी पूरी की है, जो उनके विश्लेषण में कानूनी दृष्टिकोण जोड़ती है। वे सामाजिक जागरूकता और समाजोपयोगी मुद्दों को उजागर करने के लिए सक्रिय रूप से लेखन करते हैं। विशेषज्ञता: राजनीति और प्रशासनिक रिपोर्टिंग, सामाजिक मुद्दों पर विश्लेषण, टीवी और डिजिटल पत्रकारिता, संपादकीय नेतृत्व, लाइव ब्रॉडकास्टिंग, युवाओं और बच्चों के कार्यक्रम प्रस्तुति।

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