लेखक गोकुल सोनी छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट हैं और लंबे समय से सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लेखन एवं फोटोग्राफी कर रहे हैं।

साथियो, हमारे देश की पहचान केवल उसकी संस्कृति, भाषा और परंपराओं से ही नहीं रही, बल्कि उसकी अतिथि सत्कार की भावना से भी रही है। अतिथि देवो भव केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन दर्शन का हिस्सा रहा है। आज जब यात्रा सुविधाजनक और तेज हो गयी है, तब शायद नई पीढ़ी यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि एक समय ऐसा भी था जब यात्राएं कई-कई दिनों में पूरी होती थीं और रास्ते में रुकने के लिये धर्मशालाएं, सराय, मुसाफिरखाने और रैन बसेरे यात्रियों का सबसे बड़ा सहारा हुआ करते थे।

रायपुर भी इस परंपरा से अछूता नहीं था। यहां की धर्मशालाएं केवल ठहरने की जगह नहीं थीं, बल्कि वे सामाजिक जीवन, अपनत्व, सेवा और संस्कारों की जीवंत मिसाल थीं। आज जब पुरानी इमारतें टूटकर कॉम्प्लेक्स में बदल रही हैं, तब इन धर्मशालाओं की यादें इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही हैं। आइये आज उसी पुराने रायपुर की यात्रा करें और जानें कि हमारे शहर में धर्मशालाओं की क्या भूमिका रही है।
जब यात्रा आसान नहीं थी……….
सत्तर और अस्सी के दशक तक यात्राएं आज जैसी सरल नहीं थीं। रेलगाड़ियां और बसें बहुत कम थीं। लोगों के पास निजी वाहन भी नहीं होते थे। इसलिये एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचने में कई बार दो-दो दिन लग जाते थे। जगह-जगह ट्रेन और बस बदलनी पड़ती थी।
मुझे आज भी याद है कि उन दिनों भोपाल जाने के लिये रायपुर से कोई सीधी ट्रेन नहीं थी। पहले नागपुर जाना पड़ता था, फिर वहां दूसरी ट्रेन पकड़नी होती थी। यदि ट्रेन छूट गयी तो स्टेशन या धर्मशाला में रात बितानी पड़ती थी। यही वजह थी कि यात्राएं रुक-रुक कर होती थीं और धर्मशालाएं यात्रियों के लिये किसी वरदान से कम नहीं थीं।
धर्मशालाएं : सेवा और समाजसेवा की मिसाल……..
उन दिनों बड़ी-बड़ी सामाजिक संस्थाएं, व्यापारी समाज और दानवीर लोग रेलवे स्टेशन तथा बस स्टैंड के आसपास धर्मशालाएं बनवाते थे। उनका उद्देश्य केवल एक था- यात्रियों को सुरक्षित और सस्ता आश्रय देना।
एक धर्मशाला में कई कमरे होते थे। यात्री वहां मुफ्त या बहुत मामूली शुल्क में रुकते थे। कमरों में आधुनिक सुविधाएं नहीं होती थीं। ज्यादातर जगहों पर तखत या जमीन पर ही सोना पड़ता था। छत पर एक सीलिंग फैन होता था, वही सबसे बड़ी सुविधा मानी जाती थी। उन दिनों एसी और कूलर का प्रचलन भी नहीं था।
जरूरत पड़ने पर धर्मशाला के कार्यालय से दरी या चादर मिल जाती थी।
अधिकांश धर्मशालाओं में कुआं होता था, जहां से पानी निकालकर नहाना और अन्य काम करना पड़ता था। कहीं-कहीं बड़ी पानी की टंकियां भी बनी होती थीं।
सार्वजनिक स्नानागार और शौचालय होते थे जिनका उपयोग लोग बारी-बारी से करते थे। पूरी व्यवस्था देखने के लिये एक व्यवस्थापक या केयरटेकर रहता था जो यात्रियों की मदद करता था।
देश के अलग-अलग हिस्सों में इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता था — कहीं सराय, कहीं मुसाफिरखाना, कहीं रैन बसेरा।
धर्मशालाओं का “बासा” और घर जैसा भोजन……..
उन दिनों लोग बाहर होटल का खाना कम ही खाते थे। इसलिये अधिकांश धर्मशालाओं में “बासा” की व्यवस्था होती थी। यहां यात्रियों को घर जैसा भोजन मिलता था चावल, दाल, रोटी और सब्जी।
कीमत इतनी कम होती थी कि गरीब से गरीब यात्री भी सम्मान के साथ भोजन कर सके। यहां जमीन पर बैठ कर खाना पड़ता था। कई यात्री तो स्वयं खाना बनाते थे। यही कारण था कि धर्मशालाएं केवल रहने की जगह नहीं बल्कि अपनत्व का केंद्र हुआ करती थीं।
रायपुर की प्रसिद्ध धर्मशालाएं…….
यदि मैं रायपुर की बात करूं तो अस्सी के दशक तक यहां लगभग 10-12 प्रमुख धर्मशालाएं थीं, जहां धार्मिक यात्रियों से लेकर सामान्य मुसाफिर तक ठहरते थे। इनमें से अधिकांश रेलवे स्टेशन के आसपास थीं।
रायपुर की प्रमुख धर्मशालाओं में —
- सत्यनारायण धर्मशाला
- कच्छ गुर्जर गुजराती धर्मशाला
- अहीर धर्मशाला
- श्रीराम धर्मशाला
- फाफाडीह की सईसुतार धर्मशाला
- ब्रह्मसमाज धर्मशाला
- दयाभवन
- गिरधर भवन धर्मशाला, सदर बाजार
- शिव धर्मशाला, सदर बाजार
- कृष्णा धर्मशाला मालवीय रोड
विशेष रूप से स्टेशन रोड स्थित सत्यनारायण धर्मशाला और कच्छ गुर्जर धर्मशाला आज भी पुराने रायपुर की पहचान मानी जाती हैं। सत्यनारायण धर्मशाला वर्ष 1955 में बनी थी। सोचिये, सात दशक गुजर जाने के बाद भी इसकी दीवारें आज उतनी ही मजबूत दिखाई देती हैं। इसके सामने स्थित अहीर धर्मशाला भी उसी दौर की याद दिलाती है। सदर बाजार स्थित गिरधर भवन धर्मशाला का निर्माण पुरोहित परिवार द्वारा कराया गया था, जबकि मालवीय रोड की कृष्णा धर्मशाला रूपरेला परिवार द्वारा बनवाई गई थी।
स्टेशन रोड पर गुरुद्वारे के पास एक बहुत बड़ी मारवाड़ी धर्मशाला हुआ करती थी। यह धर्मशाला यात्रियों के लिये बेहद प्रसिद्ध थी, लेकिन व्यवसायीकरण की दौड़ में वह टूट गयी और वहां बहुमंजिला कॉम्प्लेक्स बन गया।
धर्मशालाएं केवल ठहरने की जगह नहीं थीं…………
आज की तरह बड़े-बड़े ऑडिटोरियम और होटल हॉल उस समय नहीं थे। इसलिये धर्मशालाएं सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र थीं। सत्यनारायण धर्मशाला में यात्रियों के अलावा धार्मिक आयोजन, सामाजिक बैठकें और राजनीतिक कार्यक्रम भी हुआ करते थे। कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के कई कार्यक्रम वहीं आयोजित होते थे।
सदर बाजार की गिरधर भवन धर्मशाला, शिव धर्मशाला और मालवीय रोड की कृष्णा धर्मशाला भी सामाजिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र थीं। यहां आने वाले यात्रियों के लिये मारवाड़ी बासा में बहुत कम कीमत पर घर जैसा भोजन मिलता था।
बस स्टैंड के रैन बसेरे…………
धर्मशालाओं के अलावा सरकार की ओर से भी यात्रियों के लिये बस स्टैंडों में बड़े-बड़े हाल बनवाये जाते थे, जहां लोग अगली बस का इंतजार करते हुए रात बिताते थे। नगर निगम रायपुर ने भी “रैन बसेरा” बनवाये थे, लेकिन समय के साथ वे अव्यवस्था का शिकार हो गये। यदि इनका सही रखरखाव होता तो आज भी हजारों जरूरतमंद यात्रियों के काम आ सकते थे।
व्यवसायीकरण ने बदल दी तस्वीर…………..
समय बदला, यात्रा के साधन बढ़े, होटल संस्कृति विकसित हुई और शहरों में जमीन की कीमतें बढ़ती चली गयीं। इसके बाद धर्मशालाओं की जमीन व्यवसायिक दृष्टि से कीमती हो गयी।
धीरे-धीरे कई धर्मशालाएं टूटती चली गयीं और उनकी जगह बहुमंजिला कॉम्प्लेक्स खड़े हो गये। जो बची हैं, वहां अब यात्रियों से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। नई पीढ़ी शायद यह नहीं जानती कि कभी धर्मशालाएं यात्रियों की जीवनरेखा हुआ करती थीं।
एक दौर जो इतिहास बनता जा रहा है………
आज जब हम पुराने रायपुर की बात करते हैं तो केवल इमारतों की चर्चा नहीं करते, बल्कि उस दौर की चर्चा करते हैं जहां सेवा, अपनत्व और समाजसेवा जीवन का हिस्सा थे। धर्मशालाएं उस संस्कृति की प्रतीक थीं जिसमें अनजान मुसाफिर भी अपना लगता था।
वे केवल ईंट और पत्थर की इमारतें नहीं थीं, बल्कि मानवता की जीवित मिसाल थीं। वहां ठहरने वाला हर यात्री अपने साथ शहर की आत्मीयता लेकर जाता था।
आज भले ही धर्मशालाओं की जगह आधुनिक होटल और कॉम्प्लेक्स ने ले ली हो, लेकिन पुरानी पीढ़ी की स्मृतियों में वे अब भी जीवित हैं। आने वाले समय में शायद यही स्मृतियां इतिहास का दस्तावेज बनेंगी और नई पीढ़ी को बताएंगी कि कभी रायपुर ऐसा शहर था जहां मुसाफिरों के लिये दरवाजे ही नहीं, दिल भी खुले रहते थे।
धर्मशालाओं के दौर के बाद रायपुर में लॉज संस्कृति शुरू हुई। धीरे-धीरे यात्रियों की जरूरतें बदलीं और फिर आधुनिक होटलों का दौर आ गया। अब तो शहर में सितारों वाली आलीशान होटलें हैं, जहां स्वीमिंग पूल, मसाज सेंटर और हर तरह की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
सुविधाएं भले बढ़ गयी हों, लेकिन धर्मशालाओं जैसी आत्मीयता, सादगी और मन को सुकून देने वाली शांति शायद अब कहीं दिखाई नहीं देती। वहां ठहरने पर ऐसा लगता था मानो किसी अपने के घर आ गये हों।
