अश्विनी वैष्णव, लेखक, भारत सरकार के रेल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं

भारत में हर दिन 25,000 से अधिक ट्रेनें चलती हैं। वे प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक यात्रियों को ले जाती हैं और कोयला, लौह अयस्क, अनाज, स्टील, सीमेंट तथा अन्य वस्तुओं की बड़ी मात्रा को 1,37,000 किलोमीटर से अधिक लंबे रेल नेटवर्क पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती हैं।
पूरी व्यवस्था जिस आधार पर काम करती है, वह रेल पटरी है। जब पटरी अच्छी स्थिति में होती है, तब ट्रेनें सुरक्षित रूप से अधिक गति से चलती हैं। लेकिन जब पटरी खराब होती है, तो इसके परिणाम गति पर रोक, देरी और सुरक्षा संबंधी जोखिम के रूप में सामने आते हैं। रेल की पटरी में दरार, कोई ढीला पुर्जा या गिट्टी की परत में रुकावट, इनमें से कोई भी चीज ट्रेन की चाल को प्रभावित कर सकती है।
रेल पटरियों के महत्व को ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेलवे ने एक दशक से अधिक समय पहले व्यापक आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्य में आधुनिक मशीनों से पटरियों का नवीनीकरण, उन्नत तरीकों से जांच और निरीक्षण, मशीनीकृत रखरखाव, सुरक्षा बाड़बंदी आदि शामिल थे। इन सभी प्रयासों ने मिलकर रेल नेटवर्क की स्थिति को स्पष्ट रूप से बदल दिया है।
2014 से अब तक लगभग 55,000 किलोमीटर पटरियों का नवीनीकरण किया गया है, जिससे सुरक्षा और यात्रा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है तथा बार-बार मरम्मत की आवश्यकता कम हुई है। लगभग 44,000 ट्रैक किलोमीटर में 260 मीटर लंबे रेल पैनल बिछाए गए हैं। लंबे पैनलों का अर्थ है कम जोड़, जिससे ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम और सुरक्षित होती है। अब 80,000 ट्रैक किलोमीटर से अधिक हिस्से में मजबूत 60 किलोग्राम वाली रेल पटरियों का उपयोग हो रहा है, जो अधिक भार और तेज गति का समर्थन करती हैं।
मजबूत रेल पटरी बिछाना जरूरी है, लेकिन समय रहते खराबी पकड़ना भी उतना ही जरूरी है। छिपी हुई दरारों को खोजने के लिए अल्ट्रासोनिक जांच की गई है। इसके तहत करीब 36.2 लाख ट्रैक किलोमीटर और 2.25 करोड़ वेल्ड की जांच हुई। इससे रेल और वेल्ड टूटने की घटनाएं करीब 90 प्रतिशत तक कम हो गई हैं। यानी अब खराबी होने के बाद उसे ठीक करने के बजाय पहले ही पकड़कर रोक लिया जाता है।
अब रेलवे में दूसरी आधुनिक जांच तकनीकें भी इस्तेमाल हो रही हैं। नई वेल्ड की जांच के लिए चुंबकीय जांच, फ्लैश-बट वेल्ड की जांच के लिए नई मशीनें और जीपीएस से जुड़ी ऐसी व्यवस्था लगाई गई है, जो ट्रेन की यात्रा की गुणवत्ता मापती है और पटरी के खराब हिस्से की सही जगह बता देती है।
भारतीय रेलवे की ट्रैक मशीनों की संख्या 2014 में 748 थी, जो 2026 में बढ़कर 1,785 हो गई है। ये मशीनें पटरी को ठीक करने, गिट्टी साफ करने और रेल को घिसकर बराबर करने का काम हाथ से होने वाले काम की तुलना में ज्यादा तेज, बेहतर और एक समान तरीके से करती हैं।
पटरी के नीचे बिछी गिट्टी की परत को साफ करने में मशीनों ने बड़ा फर्क पैदा किया है। यही गिट्टी पानी निकालने, कंपन कम करने और पटरी को मजबूत बनाए रखने का काम करती है। लेकिन समय के साथ ट्रेनों के लगातार वजन और कंपन से ये पत्थर टूटकर पाउडर जैसे हो जाते हैं। इससे गिट्टी की परत जाम हो जाती है और वह ठीक से काम नहीं कर पाती।
इसलिए गिट्टी की सफाई की जाती है, ताकि पटरी फिर से सही हालत में आ जाए। यह काम एक लाख किलोमीटर से ज्यादा रेल पटरियों पर किया जा चुका है और ज्यादातर काम मशीनों से हुआ है। इसी तरह पटरी की ऊपरी सतह की खराबी दूर करने के लिए भी एक लाख किलोमीटर से ज्यादा रेल की ग्राइंडिंग की गई है। इससे ट्रेन का सफर ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित हुआ है।
हर साल ट्रेनों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए ट्रेनों के बीच रखरखाव के लिए मिलने वाला समय कम होता जा रहा है। ऐसे में मशीनों की मदद से कम समय में ज्यादा काम हो जाता है और ट्रेन सेवाएं भी प्रभावित नहीं होतीं। लेकिन सुरक्षा सिर्फ पटरी पर नहीं, बल्कि वहां भी जरूरी है जहां ट्रेनें लाइन बदलती हैं। इसलिए भारतीय रेलवे ने पटरी बदलने के साथ कई दूसरे सुधार भी किए हैं। करीब 17,500 किलोमीटर तक सुरक्षा के लिए बाड़ लगाई गई है, खासकर उन जगहों पर जहां ट्रेनें 110 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा रफ्तार से चलती हैं। इससे लोगों और जानवरों के पटरी पर आने की घटनाएं कम होती हैं।
जहां ट्रेनें एक लाइन से दूसरी लाइन पर जाती हैं, वहां 36,000 नए और मजबूत स्विच लगाए गए हैं और 7,500 खास तरह के क्रॉसिंग लगाए गए हैं। ये ज्यादा समय तक चलते हैं और ट्रेन को बिना झटके के गुजरने देते हैं। 2019 से चौड़े और भारी स्लीपर लगाए जा रहे हैं, जिससे पटरी ज्यादा मजबूत रहती है, खासकर गर्मियों में। पुलों पर भी मजबूत स्लीपर लगाए गए हैं और यार्ड के अंदर लंबी वेल्ड वाली पटरियां बिछाई गई हैं। इससे पूरा रेलवे नेटवर्क और मजबूत हुआ है।
रेल पटरियों के आधुनिकीकरण का सबसे साफ असर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने की क्षमता के रूप में दिखाई देता है।
130 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार के लिए तैयार रेल पटरी का हिस्सा पहले सिर्फ 6 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर करीब 23 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह 110 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार वाली पटरी पहले करीब 40 प्रतिशत थी, जो अब 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे सफर का समय कम हुआ है, ट्रेनें ज्यादा समय पर चल रही हैं और वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी तेज ट्रेनें चलाना आसान हुआ है।
इन सुधारों का असर सुरक्षा पर भी दिखा है। 2014-15 में 135 बड़े रेल हादसे हुए थे, लेकिन 2025-26 में यह संख्या घटकर सिर्फ 16 रह गई। यानी हादसे लगभग 89 प्रतिशत कम हो गए। हर 10 लाख किलोमीटर चलने वाली ट्रेनों पर हादसों की दर भी 0.11 से घटकर 0.01 हो गई है। यह लगभग 90 प्रतिशत सुधार है। खास बात यह है कि ट्रेनों और यात्रियों की संख्या बढ़ने के बावजूद हादसे कम हुए हैं।
अब रेलवे ने एक नई ऑनलाइन व्यवस्था भी शुरू की है, जिसे ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम(टीएमएस) कहा जाता है। इसमें पटरी की जांच, ट्रेन के सफर की गुणवत्ता और पटरी की हालत से जुड़ी सारी जानकारी एक जगह मिल जाती है। इससे रेलवे को जल्दी समझ आ जाता है कि कहां काम करने की जरूरत है और समय रहते सुधार किया जा सकता है।
बारह साल पहले भारत की 60 प्रतिशत रेल पटरियां 110 किलोमीटर प्रति घंटे से कम रफ्तार तक ही सीमित थीं। रेल पटरी टूटने की घटनाएं आम थीं और ज्यादातर रखरखाव हाथ से किया जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। अब करीब 80 प्रतिशत रेल नेटवर्क 110 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार संभाल सकता है। रेल और वेल्ड टूटने की घटनाएं 90 प्रतिशत तक कम हो गई हैं और करीब 1,800 ट्रैक मशीनें काम कर रही हैं।
लाखों यात्रियों और रेल माल ढुलाई पर निर्भर कारोबारों के लिए इन बदलावों का बड़ा असर पड़ा है। अब सफर ज्यादा आरामदायक हुआ है, यात्रा का समय कम हुआ है और रेलवे नेटवर्क पहले से ज्यादा भरोसेमंद बना है। काम अभी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन अब तक हुई प्रगति यह दिखाती है कि लगातार मेहनत और निवेश से कितना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
